
जयपुर। शहर में पहली बार धार्मिक आयोजन में प्रवेश के लिए तिलक अनिवार्य किया गया है। मानसरोवर वीटी रोड स्थित मेला ग्राउंड में 15 से 21 दिसंबर तक होने वाली 7 दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा में बिना तिलक लगाए कोई भी श्रद्धालु कथा स्थल पर प्रवेश नहीं कर सकेगा। यह घोषणा प्रसिद्ध आध्यात्मिक प्रवचनकार आचार्य देवकीनंदन ठाकुर ने जयपुर में की।
आचार्य ठाकुर ने कहा कि “तिलक हमारी पहचान, संस्कृति और सम्मान का प्रतीक है। यह केवल धार्मिक चिन्ह नहीं, बल्कि आस्था और संकल्प का चिह्न है।” उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया—“नो तिलक, नो एंट्री।”
आध्यात्मिक वक्ता ने कहा कि आज की पीढ़ी आर्थिक और तकनीकी रूप से आगे बढ़ रही है, लेकिन धार्मिक ज्ञान और परंपरा से दूरी बढ़ती जा रही है। बच्चों में वेद, पुराण, गीता और रामायण जैसी धरोहरों की समझ कमजोर हो रही है। उन्होंने कहा, “बच्चा विज्ञान में निपुण है, लेकिन परिवार, समाज और दायित्व की समझ उतनी विकसित नहीं हो पाती। अध्यात्म समाज को मजबूत करने की शक्ति है।”

देवकीनंदन ठाकुर ने जयपुरवासियों से अपील की कि कथा में केवल मनोरंजन की दृष्टि से नहीं, बल्कि विधि–विधान और संस्कृति के सम्मान के साथ शामिल हों। युवाओं से उन्होंने कहा, “प्रतिष्ठा अपने लिए नहीं, समाज और धर्म के लिए बनाई जाए। यदि धर्म और राष्ट्र सर्वोपरि हैं, तो कथा में आना चाहिए।”
मीडिया से बातचीत में आध्यात्मिक कथावाचक ने इतिहास और वर्तमान परिस्थितियों पर भी तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश को संस्कृति, परिवार और आस्था से जोड़ने की आवश्यकता है। गौ–हत्या, वृद्ध–आश्रमों की बढ़ती संख्या, गंगा की स्थिति और सांस्कृतिक विकृति पर उन्होंने चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि बॉलीवुड ने तिलक, कलावा और शिखा को ढोंग बताकर संस्कृति को कमजोर किया, लेकिन अब समाज जागरूक हो रहा है। उन्होंने वृंदावन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बड़ी संख्या में लोग तिलक धारण करते हैं और शिखा परंपरा भी वापस लौट रही है।


