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क्या चुनाव से पहले ही हनुमान बेनीवाल ने मान ली हार,2028 में नहीं लड़ेंगे चुनाव?

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जयपुर: राजनीति में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता । लेकिन राजनीतिक संकेत अक्सर ऐसा खाका खींच देता है, जिससे ‘लिफाफे का मजमून’ समझ आ जाए। कुछ ऐसा ही अब बड़ा सियासी संकेत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के मुखिया और नागौर (Nagaur) से सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी दे दिया है। पिछले तीन-चार दिनों से जयपुर के शहीद स्मारक पर SI भर्ती रद्द करवाने की मांग को अड़े हुए बेनीवाल ने यह बता दिया है कि वो अब अपने राजनीतिक भविष्य को किस ओर मोड़ेंगे। दरअसल, हाल ही में बेनीवाल ने यह बयान दिया है कि साल 2028 का राजस्थान विधानसभा चुनाव उनकी आखिरी सियासी लड़ाई होगी। उन्होंने साफ किया कि इसके बाद वह खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे और आगे की राजनीति के लिए गठबंधन का रास्ता अपनाएंगे। लिहाजा, संघर्ष का प्रतीक बन चुके हनुमान बेनीवाल का यह बयान अब राजनीतिक हलकों में हलचल मचाए हुए हैं।Thank you for reading this post, don’t forget to subscribe!

बेनीवाल के खफा होने की यह मानी जा रही है वजह

दरअसल, बेनीवाल के इस बयान को राजनीतिक पंडित कई नजरों से देख रहे हैं। उनके इस बयान के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि जयपुर में SI भर्ती आंदोलन को मजबूती देने के लिए शिद्दत के साथ जुटे बेनीवाल के धरने पर आशातीत भीड़ इकठ्ठा नहीं हो पाई है। इसकी एक वजह यह मानी जा रही है कि विरोधी उनके प्रयास अंजाम तक न पहुंचे, इसके लिए भरपूर कोशिश में लगे रहे। कांग्रेस-भाजपा के कई बड़े नेताओं के जोर के चलते बेनीवाल के धरने पर आशातीत भीड़ इकठ्ठा नहीं हो पाई। लिहाजा खुल्लम खुल्ला बोलकर दिग्गजों को चपेट में लेने वाले आरएलपी सुप्रीमो से खफा राजनेताओं ने धरने को फ्लॉप करने की रणनीति बना ली थी। बस उसी लाइन पर काम हो रहा है। इसी का नतीजा है कि बेनीवाल की वेदना शब्दों के जरिए यह बयान बनकर सामने आई है और उन्होंने 2028 के चुनाव के साथ अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर भी संकेत दे दिए।

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सामने आई बेनीवाल की पीड़ा 

दरअसल, राजस्थान की तीसरी सियासी ताकत बनने का ख्वाब पाले बैठे बेनीवाल को यह सब दिवास्वप्न सा लगने लगा है। लिहाजा, वो अब इस मसले पर पीछे हटने के संकेत भी देने लगे है। उनका कहना है कब तक संघर्ष होगा? आखिर राजस्थान की जनता कांग्रेस-भाजपा की चक्की में फिसने को ही अपना तकदीर बना चुकी है। बता दें कि कई बार राजस्थान में कांग्रेस-भाजपा के मिले-जुले खेल का आरोप जड़ते रहे हैं।

खींवसर हार से ज्यादा दुखी हुए बेनीवाल

पिछले दशक में बेनीवाल की पार्टी रालोपा का डंका नागौर के साथ-साथ पश्चिम राजस्थान के जोधपुर,बाड़मेर समेत कई दूसरे जिलों में बजने लगा। जिसके सबब वो आजादी के साथ बयानबाजी कर रहे थे, जिससे कांग्रेस-भाजपा के प्रमुख नेता असहज महसूस करने लगे। इसके चलते पिछले महिनों हुए उपचुनाव में घरेलू सीट खींवसर में ‘हाथ’और ‘कमल’ ने योजनाबद्ध तरीके से “बोतल” को निपटा दिया। बेनीवाल इस हार से बुरी तरह व्यथित है. अब घायल शेर की तरह पराजय का बदला लेने पर उतारू तो है लेकिन अभी वो सफल नहीं हो सके है। कुल मिलाकर सियासत के ‘शेर की दहाड़’ मंद पड़ी हैं। इन दिनों आ रहे उनके बयानों से साफ-साफ लगता है कि लोग संघर्ष में कम गुलामी से फायदा लेने में लगे है।

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